मंगलवार, 12 मई 2009

क्या है ब्रेकिंग न्यूज का फंडा?

आज खबरिया चैनलों में ब्रेकिंग न्यूज़ का अपना एक अलग ही महत्व नजर आता है....खैर बताने की जरूरत तो आपको होगी ही नहीं क्योंकि आप भी तो न्यूज़ चैनल के दीवाने हो चुके हैं...और आपको तो पता ही होगा कि जब भी आप न्यूज़ चैनल देखते हैं तो आपको BREAKING NEWS ही दिखाई पड़ती होगी। खबर चाहे कुछ भी हो लेकिन वह अपने में ब्रेकिंग न्यूज़ को समेटे होती है.....फिर वह चाहे एसपी साहब का कुत्ता खोने की खबर हो या फिर देश के करोड़ों लोगों के दिल की धड़कन अमिताभ बच्चन को जुकाम लगने की खबर हो....होगी ब्रेकिंग न्यूज़ ही......।

मीडिया की किसी किताब में ब्रेकिंग न्यूज़ की परिभाषा नहीं दी गई है..शायद इसीलिए ब्रेकिंग को मात्र खबर बेचने की एक मशीन के तौर पर प्रयोग किया जा रहा है। खबर की अहमियत चाहे हो या ना हो लेकिन उस खबर पर ब्रेकिंग न्यूज़ की मोहर लगना जरूरी हो जाता है नहीं तो खबर बिकेगी कैसे?... खबर को बेचने के लिए उसे ब्रेकिंग न्यूज का जामा पहनाना आवश्यक होता जा रहा है।

लेकिन क्या इससे पत्रकारिता का मजाक नहीं उड़ाया जा रहा है....यह प्रश्न जहन में कई बार आता है तो ब्रेकिंग न्यूज़ की परिभाषा,उसका महत्व आदि पर सोच विचार करने की आवश्यकता महसूस होती है...आखिर ब्रेकिंग न्यूज़ की भी तो कोई परिपाटी होनी ही चाहिए क्यों इसे टीआरपी बढ़ाने का एक साधन मात्र समझा जा रहा है। आज ब्रेकिंग न्यूज़ केवल और केवल चैनल पर चल रही खबर की महत्ता को रेखांकित करती है न कि किसी खबर को ब्रेक करती है......नहीं तो क्या किसी को जुकाम लगना या किसी का कुत्ता खोना ब्रेकिंग न्यूज़ कही जा सकती है? .......

खैर बदलते दौर में मीडिया का स्वरुप भी बदला है लेकिन इतना बदला है कि अब किसी भी खबर को परोसने से मीडिया हिचकता नहीं है....मीडिया का स्वतंत्र होना जरूरी है लेकिन इतनी स्वतंत्रता कि खबर को नाटकीय अंदाज में पेश कर दिया जाए। हालांकि आज लोगों को भी मसालेयुक्त और चटपटी खबरों को ही देखना अच्छा लगता है और उस पर भी तब जब चैनल की पूरी स्क्रीन पर उस खबर के परखच्चे उड़ा दिए जाएं...। जब पूरी स्क्रीन पर एक ही खबर को उपर-नीचे,दायें-बायें सभी जगह स्थान दिया जाएगा तो दर्शक की रूचि बढ़ना स्वभाविक है...लेकिन सवाल तो यह है कि बड़े-बड़े मीडिया संस्थानों में बैठे उच्चस्तरीय पत्रकार भी अब खबर को नहीं बल्कि खबर वाले को महत्ता देते हैं। यहां खबर वालों से मतलब है कि जिस व्यक्ति,समुदाय या पार्टी की खबर हो उन पर खबर को देखने का दबाव बढ़े...और ये लोग खबर को देखें....ताकि चैनल की टीआरपी बढ़ सके और फिर चैनल का व्यवसाय भी।

आज किसी भी व्यक्ति की पर्सनल लाइफ को भी मीडिया ब्रेकिंग न्यूज़ की संज्ञा देता है....हाल ही में हरियाणा के पूर्व डिप्टी सीएम चंद्रमोहन का ही उदाहरण लीजिए....जब अनुराधा उर्फ फ़िज़ा से दूसरी शादी कर चंद्रमोहन....मोहम्मद चांद बने तो सभी मीडिया वालों ने उसे बड़ी ब्रेकिंग बनाई और खबर के साथ कई दिनों तक खेलते रहे.....जिस चंद्रमोहन को डिप्टी सीएम के तौर पर आम आदमी पहचानता तक नहीं था उसे मात्र कुछ ही देर में देश की बड़ी ब्रेकिंग बनाकर लोगों की जुबान पर अटका दिया मीडिया ने.......। और एक महान प्रेमी युगल की जोड़ी के रूप में स्थापित भी कर दिया। सभी मीडिया संस्थानों ने फ़िज़ा और चांद मोहम्मद के लाइव इंटरव्यू भी किए और दर्शकों से उन्हें रू-ब-रू कराया। और फिर कुछ दिनों बाद जब उनके संबंधों में दरार आयी तो भी मीडिया की ब्रेकिंग का ठिकाना नहीं रहा...। अगर खबर के तौर पर देखें तो क्या इस खबर को इतनी बड़ी कहा जा सकता है जितनी यह दिखाई गई। हालांकि मेरा मानना गलत हो सकता है लेकिन इतना जरूर है कि यह ब्रेकिंग न्यूज़ नहीं कही जा सकती।

ब्रेकिंग न्यूज़ शायद वह खबर होनी चाहिए जो सामान्य तौर पर चल रही सभी खबरों को ब्रेक कर दे....जैसे बम धमाका, आतंकी हमला, सरकारी फैसला,अन्तर्राष्ट्रीय संबंध आदि की खबर। और भी कुछ खबरों को ब्रेकिंग न्यूज़ की श्रेणी में रखा जा सकता है...लेकिन ऐसी खबरों को कतई नहीं जो जनविशेष को प्रभावित न करती हों। अब अगर एसपी साहब का कुत्ता खोया तो इससे आम जनता को क्या लेना......अमिताभ को जुकाम लगी तो क्या...कुछ को तो रोज ही जुकाम रहता है तो क्या वो भी.....अब लोगों को क्या मतलब कि कौन किससे शादी करता है, क्यों करता है और क्यों छोड़ता है...पर चैनल को मतलब है...क्यों कि ब्रेकिंग का फॉर्मेट भी तो प्रयोग करना है।

माना जा सकता है कि जन-समुदाय तक किसी भी खबर का पहुंचना जरूरी है लेकिन क्या पहुंचाने का अंदाज सही है....क्या हर खबर ही ब्रेकिंग होती है....चैनल के पास खबर परोसने के और भी फॉर्मेट हैं तो क्यों न खबर के अनुसार उन्हें प्रयोग किया जाए। कुछ उच्चश्रेणीय चैनल फॉर्मेट पर काम करते हैं लेकिन सभी काम करें तो पत्रकारिता के मानक बचाए जा सकते हैं अन्यथा कुछ समय बाद मीडिया भी सरकारी खेमे की तरह बदनाम हो जाएगा......चाहे सरकार कितनी भी अच्छी हो लेकिन एक जरा सी चूक में लोग कह डालते है...`सरकारी है....` शायद मीडिया का भी यही हाल हो..। ऐसा हुआ तो चाहकर भी मीडिया की छवि को धोया नहीं जा सकेगा।